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Poems

  कब्र ताक में बैठी थी हमसे मिलने की आरज़ू लिए
  भाव हैं भाषा है, सेवा है संस्कार है,
  रज़ा में उसकी एक अदा है वो जब जो देता है
  उसकी शक्सियत का लिबास फीका था पर वो मेरे लिए ही जीता था
  दर्द नही आँखों में दास्तान है
  माँ के आँसुओं से आवाज़ आई जिसके लिए मैं सारी दुनिया से लड़ी
  स्वतंत्रता दिवस की शुभ कामनाएँ आओ देश की वीरों को याद कर
  ज़िंदगी उलझ गई तो क्या हुआ
  माँ आँसुओं की आवाज़ सुन लेती थी
  मुझे जाना है उस डगर जिसका पता नही.......
  गिर गया तो संभाल लेते हैं फँस जाउँ निकाल देते हैं,
  कुछ बातों के भवर में मैं धंस गया था
  माना मैं कबीरा नही माना मैं कोई हीरा नही
  मन के धागे तोड़ मत
  बेवफ़ाई की जैसे ही हमने हमारे दर्द से
  सुकून की चाह में सुख की रोटी ढूढ़ रहा था,
  गुरु पूर्णिमा पर हर उन विचारों , संस्कारों , वक़्त , इंद्रियों और साक्षात्कार गुरु
  कोई अपना एक पल में हमारा दिल तोड़ कर चला जाता है
  खोज रहा हूँ उसको, जिसका कोई अस्तित्व नही
  दूरियाँ इतनी बढ़ा दी तुमने कि अब पास आने से भी
  ख़याल है तुम्हारा हमारे हर अफ़साने में
  बेगैरत ना तो वक़्त है
  अजब सी परिस्थितियों में हम रहते हैं
  खूबसूरत है हर वो दिल जो किसी के मन की बात समझ पाता है,
  वाकिफ़ नही हुआ अभी तक तेरे असल अंदाज़ से ए ज़िंदगी
  यकीं रख खुदा पर/ या खुद पर बात एक ही है
  ज़िदगी में किए करमो का ही अर्थ है
  ज़िंदगी को जैसे देखोगे वो वैसे ही दिख जाएगी,
  मस्त रहते है हम ये नही पता कहाँ,
  अब रास्तों पर निकल कर मैं मंज़िल की तलाश करता हूँ...
  कहीं ना कहीं तो तू है जब तक कदमों तले ज़मीं है
  सितारों की दुनिया में उतरे हैं हम फिर भी बेजान कंकरो से करते है जंग..
  ना जाने क्यों संतोष नही मिल पा रहा था
  सवालों के दरमियाँ उनसे रिश्ते बन गए
  कारवाँ नही चल रहा बस वक़्त चल रहा है
  बाज़ार सज़ा है पर एक बार दिल से सोच
  आओ कुछ यादें ढूँढे पुरानी वो माँ के सुनहरे रंग की सारी
  कामीने है साले जब भी खाली होते हैं
  दुआओं की कमी सी लग रही है देना यारों
  प्रकृति की रूह उदास है हर साँस मे प्रदूषण का वास है........
  दुआओं में किसी अपने की घेहरा असर है जान नही मुझमें
  हर साल उस रावन को क्या मारते हो जो मर कर आज भी ज़िंदा है
  हर साँस मे मन के शब्दों को उतार मैं खुद को पूर्ण पाता हूँ
  नवरत्रों में पूजा भले ही ना करें
  अब समझ आया जंग और लड़ाई में फ़र्क क्या होता है
  किस भीड़ का आज हिस्सा हूँ
  उड़ने वाली मैं आँधी नही थम जाए जो मैं वो लम्हा नही
  सवाल उठाते लोग जो पहले नही सोचा वो अब क्यों
  भीतर छुपे आनंद की संसार में खोज है
  कंधे तो बहुत मिले राहों में हमने सोचा
  एक समारोह के समान बन गई है ज़िंदगी लोग आते हैं
  कहावत थी पुरानी आज मान गए
  पत्थरों से बात की तो उनके मॅन की बात समझ आई थी
  युहीन नही होंठों पर तेरा नाम लेने से तर जाता हूँ
  देश विदेश घूम आया सारे वेश पहन आया
  दर्द की दवा केवल वक़्त के पास है
  सुख की चाह थी सुकून की राह थी
  हमने लाबो से गुज़ारिश की थी खामोश रहना
  इंसानियत का आकाल इस तरह बढ़ता जा रहा है
  जो कल था वो आज नही जो आज है वो कल नही
  बस दो पल ही तो माँग रही थी दुख कम करने का सहारा तुझसे बाँध रही थी
  दर्द से पूछा हमने तू लोगो को तकलीफ़ देता है
  खामोशियाँ भी गवाही देती है ध्यान से सुन मुखबिर
  अब तो मान जाओ सच्चाई से आँखें मत चुराओ
  हम महकाने निकले थे उन गलियों को
  ज़िंदगी के पहलुओं से वो कब तक वाकिफ़ करेगा
  कहीं आँखों का काजल लुभता रहा
  तन्हाइयों का भंवर आज घेर रहा है
  तकलीफ़ों का भी क्या मस्त हिसाब है
  थकने लगा हूँ अब इस भाग गम भाग की ज़िंदगी से
  यूँ थक मत मुसाफिर ज़िंदगी से
  अब पता चला मौसम पर भी वक़्त का ही नूर था
  ज़िंदगी सब जी रहें हैं पर ज़िंदा कौन है ?
  ग़लत समझ बैठे थे कुछ अपने हमें
  खुवाब सीए नही जाते खुवाब जीए जातें हैं
  आपका प्रोत्साहन हममें विश्वास भरता है
  मंज़िल मिल जाएगी या खुद मंज़िल बन जाओगे
  कहते हैं किस्मत के लिखे को कोई बदल नही सकता
  मुस्कुराते रहने का हुनरहम पर यूँ भारी पड़ा
  होठों पर शरारत आँखों में अदाएं
  रूठो मगर इतना नहीं कि अपने मनाना छोड़ दें
  प्लास्टिक का करें त्याग , उगाएं पेड़
  यूँ घबराते घबराते ...... थक गया
  जब तक खामोश बैठा हूँ
  कहते हैं कश्ती डूबी वहाँ
  मैने वक़्त से करवटें बदलना सीख लिया तक गया था
  आनंद की खोज कर रहा हर मनुष्य
  मेरी बेरूख़ी तुझे मज़बूत बना रही है
  तुम्हारी खामोशी भारी मुस्कुराहट बहुत कुछ कह जाती है.
  सज़दे में माँ के हम सिर झुकाते हैं
  यूँ ही नही हम खुवाबों से मिल पाते हैं दोस्तों
  वो नज़ारे हवाओं के थे
  कुछ दोस्तयूँ रखते हैं मुझे संभाल कर
  ज़िंदगी को जेसे देखो गे
  सफ़र में अपना कोई मिल जाना चाहिए
  एक खूबसूरत वक़्त का हिस्सा हैं हम
  कहाँ गई वो खुश्बू जो हर पल में घुली थी
  वक़्त की तालीम भरी है शिक्षा से
  रिश्तों को किसी की नज़र लगी है
  जाने ज़िंदगी किस भीड़ में खो गई
  कभी मैं तुमसे अनुरोध करता हूँ
  ज़िंदगी की ख़ासियत है
  एक दिन गुस्से में मैं , माँ से यूही कह गया
  कभी उलझी भी है कभी सुलझी भी है
  ताक़त को मेरी तुम क्यों
  आँखें हर पल भीगी थी
  कविताओं के रास्ते हमनेजीवन खिलाया है
  मैं बन कबीरा उठना चाहता हूँ जग क बीड़ा
  दीपावली की बधाई हो
  दीप दीपावली के हम जलाएँ
  खुद को अभी इस काबिल नही समझते
  सुहागन का सजे सुहाग सिंदूर की राखे साजन लाज ,
  हम तुम्हारे बिना जी नही सकते
  हसीन लगती थी मैं सबको जब तक कसिन थी जब से नज़ाकत छोड़ी है
  काश हमने हर सुबह भीतर बैठे रावण को मार कर जगाई होती
  बादशाह कहते थे लोग हमें
  रिश्तों की मिठास हमारी ताक़त होती है
  हे प्रभु मैं कहीं भी कैसी भी हूँ,
  बादलों की गड़गड़ाहट कह रही है
  ज़िंदगी से शिकायते नही रखी हमने
  सपने खुवाबों में तुम रखते हो हमसे वास्ता
  एक अजीब सा रिश्ता बनता जा रहा है
  गुज़रते वक़्त के साथ हम कितना भी दौड़ लें
  हर आँख नाम नही
  मुद्दत हुई बात करे कुछ गुज़रे
  गुरु एक सागर है
  रूह की उदासी मन की पीड़ा
  क्यों हर पल हमें अपने आप से लड़ना पड़ता है
  मन की खुशी का ठिकाना नही पिता से बड़ा आशियाना नही,
  हारियाला सावन हरियाली तीज
  एक पैगाम देश वासियों के नाम
  एक ज़माना था जब इच्छा कर पर भटक मत
  हर दिन में कई दिन जी लूँ
  हम जिन गलियों में पलें हैं
  वो कहते है हमसे
  आस्था में विश्वास रखा
  पिता वो सवेरा है
  राहों में ज़िंदगी के जिस पल से
  भारत पर अभिमान करो उँचा उसका नाम करो,
  याद नही वो दिन कब माँ को गले लगा कर कहा
  खुशी की तलाश में
  ज़िंदगी जी रहे हैं
  आँखों में आँसू नही मगर दिल में उदासी है
  चाँद पैसों से बाज़ार में समान बिकता था
  गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर
  व्याकुल मन मुरझाया सा तन
  ज़िंदगी की खूबसूरती पर तभ तक धूल जमी थी
  मन डरा - डरा सा घूमे फिरा- फिरा सा,
  फूलों के देख मुस्कुराते हो
  फ़ासले मिटाना चाहते हो अगर
  मौसम का भी अपना एक अलग ही है जादू
  महोब्बत नशा तेरा इस कदर चॅड गया
  ग़लत फैमियों का असर इतना गहरा पड़ा
  ज़माने के हिसाब से चलते रहें ये सोच कर
  तेरी आँखों में आज बग़ावत देख
  जिसे मैं ढूँढती रही
  एक सवाल आज नही तो कल
  मन क्यूँ रुआंसा है
  मुक्कम्मल जहाँ की खुवाहिश रखतें हैं
  मैं फिर भी ज़िंदा हूँ
  मैं तुझे इतना चाहूँ कि देख आसमाँ झुक जाए
  सैनिक की रूह से आज हुई मुलाकात
  उनको अपना बनाने की चाह मैं
  दिन बीत जाते हैं वक़्त भी गुज़र जाता है
  काँटा माली से कहता है
  कहाँ चले गए वो दिन
  खुशी ने गम से कहा तू पैदा ही क्यों होता है
  खूबसूरत लम्हों को जब जब साथ ले
  ज़िंदगी खुश हूँ ज़िंदगी से
  रुक जाए जो वो सैलाब नही घर बैठे जो सपने देखें
  आँसुओं को आज भीगने का मन है
  रुक जाए जो वो सैलाब नही
  आँसुओं को आज भीगने का मन है
  गर रूठो तो मानना भी सीखो
  वक़्त से नाराज़ हो चला हवाओं से कहा तुमने मुझे छला
  आशिकी बढ़ती गई जैसे जैसे हमारी शायरी से
  झुकना मुनसिफ़ समझा हमने क्योंकि रिश्तों का पल्ला भारी निकाला,
  शहीदी दिवस के अवसर पर
  वक़्त ने एक बार फिर
  बेवजह की नाराज़गियों से दिल
  तुझे देखते रहना मेरे लिए ज़रूरी नही
  आज कह दिया जमाने से ना पूछो की मैं क्या चाहती हूँ,
  होली का उत्सव हो गुंजिया के साथ गपशप हो
  ईमानदारी के अंदर छुपा मिलता है समुंदर
  दो पंक्तियों में बस यही कहना चाहूँगी
  महकती है खुशबू उनके पैमाने से
  कसम है मुझे ए वक़्त अब तुझ पर भरोसा रख कर
  अनजाने कभी कभी कुछ इस तरह टकराते हैं
  ज़माना सोचता है अब ठहर जाएगी ज़िंदगी हमारी
  तुम्हारी शिकायतों की चिट्ठी पढ़ कर
  आज फिर दिल बहुत उदास है
  अजीब अजीब से पहलुओं से कई बार
  ये नज़र लगना क्या होता है ?
  गर रूठो तो मानना भी सीखो
  वक़्त से नाराज़ हो चला
  आशिकी बढ़ती गई
  झुकना मुनसिफ़ समझा हमने
  शहीदी दिवस के अवसर पर शहीदों के मन की बात कहना चाहूँगी
  वक़्त ने एक बार फिर
  बेवजह की नाराज़गियों से दिल
  तुझे देखते रहना मेरे लिए ज़रूरी नही
  आज कह दिया जमाने से
  होली का उत्सव हो
  ईमानदारी के अंदर छुपा मिलता है समुंदर
  दो पंक्तियों में बस यही कहना चाहूँगी
  महकती है खुशबू उनके पैमाने से
  कसम है मुझे ए वक़्त
  अनजाने कभी कभी
  ज़माना सोचता है
  तुम्हारी शिकायतों की चिट्ठी पढ़ कर
  आज फिर दिल बहुत उदास है
  अजीब अजीब से पहलुओं से कई बार
  ये नज़र लगना क्या होता है ?
  कदम ज़िंदगी में कभी रुकने नही चाहिए
  कैसे कहूँ मन की बात
  रूठ गई अगर ज़िंदगी
  माँ के आँचल से सिमट कर
  छू लेता है , तेरा दर्द मुझे
  अपनी कमज़ोरिओं को ढाल मत बनाओ
  मन भ्रमण
  उस वक़्त को करते सलाम
  परख में फरक
  जो अभी झुकी नही डाली
  मेरी खामोशी खामोश हूँ
  पियासा सागर अब पियासा है सागर
  क्या खूब कहा था किसी ने
  दीपावली भारत वासीओं का त्योहार है
  दिल के किसी कोने में ये आरज़ू करते हैं
  एक अजीब सा रिश्ता बनता जा रहा है
  निराशा में छुपी होती है अनगिनत आशाएं
  निकले थे ज़माने में कभी दोस्त बनाने
  पियारी माँ
  दूसरे से खुद की तुलना करखुद को ही कमज़ोर बताते है
  आपका साथ हमारे लिए आशीर्वाद है
  मौसम के रंगों के साथ
  उलझनों में उलझी ज़िंदगी
  कुछ इस तरह मैं वक़्त से टकराया,,,,,
  तुमने ये अचानक क्या कह दिया
  तुम्हारी खामोशी को नज़र अंदाज़ कर
  खामोशी की लेकर आड़
  केसे ब्यान केरूँ
  सोचते हैं की हम इतना क्यूँ सोचते हैं
  बेख़बर थे हम इस खबर से
  मेरे प्रभु मुझे पर कृपा करो
  मुक्कदर से पूछ बैठते हैं हम
  कोटी कोटी उन देश भक्तो को नमन
  सागर का उछलता पानी
  एक था समुंदर एक परिंदा
  गुज़रते वक़्त में इतनी ताक़त होती है
  यूँ सोचते है कि इस तरह थम जाने में भी कोई समझदारी होगी
  आवाज़ दी तो पहचाना नहीं
  शब्द शब्द सुना जाए हर कोई
  उनका चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रहा था
  परवाह करके बेपरवाह क्यूँ छोड़ जाते हो
  अजीब सी है उलझन
  बात सिर्फ़ समझने की है
  इजाज़त नही दूँगी तुम्हें अब दिन में मिलने आने की
  ये केसा मोह का दल दल है
  ख्वाहिशे बेकसूर हैं
  सवाल करते रिश्ते की क्या ज़रुरूई है?
  माँ के हिस्से में आँसू क्यूँ आ जातें हैं
  मुझे खुद से मिलवाने के लिया तेरा शुक्रिया
  सिखाता है पानी किस तरह अपनी जगह बनानी
  तज़ुर्बे ज़िंदगी के हर पल हमे सीखते हैं
  समुंदर की गहराई माँ के आँचल की लंबाई
  कहाँ कहाँ घूम रहा हूँ
  देह्शिय्त मौत की नहीं ख़ौफ़ ज़िंदगी का सताता है
  गुरु की शान गुरु का गुणगान
  सूरज की किरने रास्ता ढूंडे कभी खिड़की से झाँके तुझे कभी तेरी मुंडेर पर झूमें, तेरे इंतेज़ार
  तुम कहो मैं सुनु किताब के हर पन्ने में एक कहानी रचु,
  सवालों के कठग्रे में खड़े रहना चाहते है हम क्योंकि
  तुमसे बेहतर ये तनहाईयाँ हैं बिना बताए छोड़ कर नहीं जाती.....
  किस खुदा की खोज में तू दर दर भटकता
  अकेले चलते चलते मंज़िल पर थक गया
  मेरी प्रार्थना खामोशी को कलम के साथ जोड़ने का प्रयास करती रहूँ
  गलत फैमियाँ होना जायज़ हैं
  ज़िंदगी एक इतेफ़ाक है यूँ कह लो एक मज़ाक है
  झूम उठता है तन जब भी करती हूँ मन भ्रमण
  तेरे आँसुओं की कीमत हम कभी चुका नही पाएँगे
  तक़लीफ़ होती है तुझे ऐसे देख,
  कोई शाम तेरी याद बिना गुज़रती नही
  मैने समय से सीखा है
  बेगुनाह बच्चें बने बेज़ुँबा (आतंकवादी हमलों मैं मारे गए बेगुनाह बच्चों को समर्पित )
  प्रायश्चित एक अनुभव एक बात रखना याद
  मेरी गुहार खुली हवा मैं साँस लेता हूँ
  सोचा एक दिन जी कर देखें तेरे बिन
  जिसे तराश्ते रहे अपना बनाने के लिए ज़िंदगी भर
  विषय मिले मुझे कोई भी
  वो पल मैं भूल नहीं पाता हूँ
  एक भारत श्रेष्ट भारत
  झौंके हवा के कुछ कहते हैं हमें
  ए खुदा बता रस्तो को मंज़िलों से मिला
  मुसाफिर से पूछा तुझे कहाँ जाना है,
  सुकून के साथ होता है किसका एहसास ?
  ए खुदा के बंदे तू उनको क्यू देखता है
  एक प्रधान मंत्री ऐसा भी (नरेंद्र दामोदर दास मोदी )
  मशहूर होते हैं वे लोग
  क्यों सोचते ही रह जाते हैं
  कहा था तुमसे कि बहोत पियर करती हूँ
  कोई साथ हो तो क्या बात हो
  लम्हें कहते हैं
  खुद पर ना कर इतना गुमान
  वक़्त के साथ खेलने की कोशिश मे जब नाकाम हुए, तभ समझ आया
  आज फिर माँ की गोद मे सिर रख कर सोने का
  जि़न्दगी के कुछ पलों को फिर ढूँढने निकला था मैं
  रगो में खून दौड़ता है
  माँ जीवन मे अनमोल है
  आज फिर एक मासूम बच्ची दर्द से कराह रही है
  आज एक अजीब सी कश्मक्श मे है दिल फसा हुआ,
  जाने सफ़र किसका कितना लंबा है
  एक दास्तान सुनती हूँ, अनचाहा आईना दिखती हूँ
  आँसुओं के बेह्ते तक्दीर खुद ब खुद तस्वीर बन गई
  जब किसी दुहीता कि कारण वश शादी नही हो पती
  एक महान शक्सिहत को शत शत प्रणाम
  सलामत रहे दोस्ती हम सब की कुछ इस तरह.....
  मैं नही कह पाई पर तुम तो कह सकते थे
  निकली हूँ आज लेकर अपना पिटारा शायद किसी के काम आ जाए
  भीगी भीगी तेरी पलके जब मेरे आँचल मे छलके
  ये वक़्त तेज़ी से भाग रहा है , या हम........?
  हर कदम पर साथ चलना
  वक़्त कम्बक़्त क्या क्या दिखता है
  अब हर पल लगता हैं बेज़ुबान