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Poems

 निकले थे ज़माने में कभी दोस्त बनाने

 

निकले थे ज़माने में कभी दोस्त बनाने

क्या क्या तज़ुर्बे मिले

जो लिख बैठे कई फसाने,

जो बाते अच्छी करता था

वो हर बार दिल में नही उतरता था,

जो बोलता था सोच सोच कर

उसके साथदूरदूर चलताथा,

एक खामोशी को जकरे बैठा रहा

उसे भला कैसे करें वफा,

एक ऐसा भी टकराया

जो पहली नज़र में ही मन को भाया

पर इतनी जल्दी किस तरह कहते

कि तेरे पियार में बहते,

माजरा अजीब सा था

कभी दूर कभी करीब सा था,

सोच में पड़ गया

शायद वक़्त से डर गया,

जानते हो रास्ता कब मिला

जब मैं हार गया

और सिर्फ़ वो जो मन को भाया था

उस ही पल

अपना सब कुछ मुझ पर वार गया,

निकले थे ज़माने में

दोस्त बनाने

क्या तज़ुर्बामिला कि

लिख बैठे कुछ अफ़साने..........