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Poems

 उलझनों में उलझी ज़िंदगी

 

उलझनों में उलझी ज़िंदगी

किस तरह लगती है

में ढूंडू उत्तर में

वो पच्छिम में मिलती है

आँख मिचोली खेलती है मेरे संग

जाने केसी है ये जंग

वो मुझसे है परेशन

इस बात से मैं हूँ हैरान ,

खुद से ही खुद की लड़ाई

ये कैसी दुविधा में मैं आई

मन की सुनूँ

या कदमों की

इन चंद पैसों से.............

रोटी खरीदुं

या मल्हम ज़ख़्मो की.........