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Poems

 परवाह करके बेपरवाह क्यूँ छोड़ जाते हो

 

परवाह करके बेपरवाह क्यूँ छोड़ जाते हो

समुंदर के किनारे बिठा कर

पानी का रुख़ क्यूँ मोड़ जाते हो,

तुम्हारा साथ ........ ही हमारी असली दावा है

बिन तुम्हारे मंज़िल को ताकना भी एक सज़ा है,

सब्र को तो हम फिर बाँध लेंगे

तुम पियार से पुकार कर देखो

कदमों को वहीं थाम लेंगें ..........