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Poems

 निकली हूँ आज लेकर अपना पिटारा शायद किसी के काम आ जाए

 

निकली हूँ आज लेकर अपना पिटारा
शायद किसी के काम आ जाए
और मिल जाए मेरे खुवाबो को किनारा,
सारी उमर का तज़ुर्बा है
मेरी इस झोली मे,
इस उम्मीदपर ,
की शायद खुशियाँ बाँट सकूँ
किसी की खोली मे,
क्युकि.......
देखती हूँ जब चारो ओर
लाचारी का कहर,
ग़रीबी की मार और लोगो को मजबूरी का पीते ज़हर,
बहुत तकलीफ़ होती है
बस उन लोगो के लिया कुछ करना चाहता हूँ
उनसे उनके दुखो को हरना चाहता हूँ..