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Poems

 बेगुनाह बच्चें बने बेज़ुँबा (आतंकवादी हमलों मैं मारे गए बेगुनाह बच्चों को समर्पित )

 

बेगुनाह बच्चें बने बेज़ुँबा    (आतंकवादी हमलों  मैं मारे गए बेगुनाह बच्चों को समर्पित )

 माँ हमारी हर आवाज़ सुनतीथीं

हमारेलिए अनगिनत सपनो को बुनती थीं,

सब सपने चकना चूर हो गए

ज़ालिमो के हाथो मरने पर हम मजबूर हो गए,

अब पिता के कंधों पर हमारी अरथी थी

माँ हर आहट से डरती थी,

क्योंकि पालती थी वो जिसे बड़े नज़ो से

खिलती थी जिसे अपने हाथो से,

आज उसे ही कफ़न पहनाया था

मिट्‍टी में दफ़न कराया था,

अब माँ की आँखों में केवल नीर हैं

ज़ालिमो ने घोंपे छाती में ऐसे तीर हैं ,

इन ज़ख़्मो को माँ कभी भर नही पाएगी

इस पीड़ा को सहते सहते शायद एक दिन मर ही जाएगी,

जाने हम बच्चो ने ऐसा कौन सा किया था गुनाह

जो माँ के आँचल को छोड़ इस तरह हुए फनाह,

रुंह भी रो रही है आज माँ बाबा की

अपने कलेजे के टुकड़ो को जो गवाया था

पल में मकान बन गया शमशान

क्योंकि हर लम्हे को बेबसी की आग में ज़ालिमों ने जलाया था,

अब माँ की याद हमें कब्र में भी तड़पाती है

क्योंकि वो हमे याद कर सारा दिन लोरी गाती है..... |