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Poems

 मेरी गुहार खुली हवा मैं साँस लेता हूँ

 

मेरी गुहार

खुली हवा मैं साँस लेता हूँ

फिर क्यूँ धुआँ दिखता है

ज़मीन पर खड़ा हूँ

पर कुआँ दिखता है,

रास्तों पर चलता हूँ

तो लगता है

फिसलता हूँ,

काँटे चुभते हैं पैरों में

पर चप्पल मैं सुराक नहीं दिखता हैं,

हर चीज़ है मौजूद

पर जाने क्यूँ नहीं है कोई वजूद ,

जेब मे हैं पैसे खरचने को

पर बाज़ार में कुछ नहीं बिकता है,

क्यूँ है ये घोर अंधकार

जो भींच रहा है मुझे लगातार,

दृष्टि है पर दिख नहीं रहा

क्या कोई सुन भी नही रहा मेरी गुहार?