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Poems

 सोचा एक दिन जी कर देखें तेरे बिन

 

सोचा एक दिन जी कर देखें तेरे बिन

पर क्या बताउँ केसे था काटा,

जहाँ तक नज़रें थीं

वहाँ तक था सन्नाटा ,

हर चीज़ अपनी जगह पर ही थीं

पर उजाले मे कमी थी,

प्रतिदिन की भाँती निरंतर चल रहा था सब

पर इल्म ना हुआ

कि कब दिन शुरू और ख़तम हुआ कब,

कुछ ही घंटे काफ़ी रहे सब समझने के लिए

हर चीज़ को प्रेम चाहिए ज़िंदा रखने के लिए.......