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Poems

 जिसे तराश्ते रहे अपना बनाने के लिए ज़िंदगी भर

 

जिसे तराश्ते रहे अपना बनाने के लिए ज़िंदगी भर

क्या पता था वो एक दिन हमारी ही लेगा ख़बर,

समझ नही पाए हम क्या था ये खेल

और ना ही रख पाए सबर,

क्युकि हालात के ही हाथों ठोकर खाई थी

अपनो से ही मिली जुदाई थी,

जिसके लिए हमने हर चीज़ ठुकराई थी

उस ही ने हमारी इज़्ज़त सरे बाज़ार लुटवाई थी,

आज किनारा मिला भी तो लगता कि भंवर मैं फँस गए

जिस घर को खुद प्रेम की ईंटों से सींचा था उस मैं उस ही के साथ धँस गए.......