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Poems

 हम महकाने निकले थे उन गलियों को

 

हम महकाने निकले थे

उन गलियों को

जहाँ गम का बसेरा था

चिराग लिए रोशिनी से मिलवाते थे

फिर भी दिलों में अंधेरा था ,

 नफ़रातों के बीज से वो उग चुके थे 

इसलिए हर तरफ मेरा तेरा था ,

 हम फिर भी अपनी ज़िद का हाथ थाम 

निकल चले थे ,

क्योकि हमारे ख्वाबों ने अपने ओरे से 

हमको घेरा था................