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Poems

 कहीं आँखों का काजल लुभता रहा

 

कहीं आँखों का काजल

लुभता रहा

 कोई होंठों की लाली चुराता रहा

महफ़िल से जब वो निकलते थे

महोब्बत खुद समा बनाता रहा,

 जान गया था वक़्त

कि यहाँ खुदा वास कर रहा है

खामोशी शहनाईयां बजा रही है

जन्मो का साथ बँध रहा है.........