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Poems

 कभी उलझी भी है कभी सुलझी भी है

 

कभी उलझी भी है

कभी सुलझी भी है

कभी मेरे हाथ में तुलसी भी है

पर गुज़रते हालत में कई बार मैं खुद को संभाल नही पाता हूँ

मेरे प्रभु मैं तुझमे मन बसाना चाहता हूँ

रास्तों पर अक्सर मैं फिसल जाता हूँ

मैं तुलसी की कीमत क्यों नही समझ पाता हूँ

मैं तेरे सिवा अब और कुछ नही समझना चाहता हूँ

मेरे मौला मेरे सद गुरु

मुझे बना इस काबिल कि मैं तुझे अपने मन का मलिक बना, तेरे मन में जगह बनाना चाहता हूँ........