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Poems

 मैं बन कबीरा उठना चाहता हूँ जग क बीड़ा

 

मैं बन कबीरा

उठना चाहता हूँ जग क बीड़ा

कहाँ से शुरू करूँ

कोई बतलादे बन गुरु ,

मैं साथ समुंदर के रहूं

सराहना चाहता हूँ हर खुश्बू

वक़्त को सलाम करता

फिर कदम रखूं

दिल में अनगिनत आरज़ू लिए

संग सबके चलूं ,

चाहता हूँ कुछ ऐसा बनाना ये जहाँ

की मुस्काराकर मेरा खुदा कहे

तू मुझमें नही

मैं तुझमें बासू.................