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Poems

 व्याकुल मन मुरझाया सा तन

 

व्याकुल मन

मुरझाया सा तन

सुना रहा है दास्तान

किस भीड़ में खो रहा है इंसान ,

वक़्त नही रहा

एक दूजे के लिए

अपनों का साथ छोड़ कमा रहें है

जाने किस के लिए ,

 इंसान खुद को महत्वाकांक्षाओं की आग में सेक रहा है

अपनो को तड़पता हुआ देख रहा है,

 माँ बाबा वक़्त से पहले बूड़े बना दिए

एहसास जाने किस - समुंदर में बहा दिए,

 सोने में लिपटा है आज

पर सो नही पाता

पैसे की चकाचौंध से घिरा है

पर मन में रहता सन्नाटा,

समा बँधा रहें

हम तुम झूमते रहें,

 वक़्त भी कुछ पल के लिए नज़रे चुरा लें

तू मुझे पियार में इस तरह बहा लें,

 इसी दो पल की ज़िंदगी में सुकून का एहसास है

जो भी चाहा मैने

वो इस पल मेरे पास है