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Poems

 कहाँ चले गए वो दिन

 

कहाँ चले गए वो दिन

जब हम जी नही पाते थे एक दूसरे के बिन

संग तुम्हारे वक़्त बिताने को

मैं सबसे लड़ लेती थी,

काम कोई कुछ भी देदे

तुझसे मिलने की तलप में सब

कर लेती थी,

आज मिलना क्या छूटा

काम ख़त्म ही नही हो पाते मेरे

जब दिन भी छोटे लगते थे

और अब लगता है

सूरज भी उगता है देर से सवेरे

भूक भड़ गई है मेरी

पियास अब बुझती नही,

तुझसे मिलने के वक़्त को ही याद

कर ज़िंदा हूँ

वरना ज़िंदगी मुझमे अब बस्ती नही...........