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Poems

 बेवजह की नाराज़गियों से दिल

 

बेवजह की नाराज़गियों से दिल

कुछ इस कदर टूटा है

लगता है अब हर रिश्ता जूठा है,

वो सब जो प्रेम ने बोया था

जाने किस आग में झोंका है

फिरसे हाथ बढ़ाने का इस बार

मन नही होता है,

पर कैसे जिएंगे 

ये सोच - सोच कर

वही मन रोता है

आज लगता है

आदमी एहम के आगे वाकई छोटा है,

मन का समुंदर  क्यों फूट फूट कर रोता है

उँची छलाँग मार 

 मेरे अतीत को भिगोता है,

हरा हुआ दिल फिर कहता है 

छोड़ माना ले

तेरा रिश्ता छोटा है

कदम कहते हैं 

नही अब नही

ज़मीर भी कुछ होता है,

.........................

आख़िर आदमी एहम में आकर

रिश्ते क्यों खोता है.................