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Poems

 जब किसी दुहीता कि कारण वश शादी नही हो पती

 

जब किसी दुहीता कि कारण वश शादी नही हो पती
किस प्रकार वो हर पल मरती या मारी जाती,
पर उसकी पीड़ा समझता नही कोई
ताने ,उल्हाने , ना जाने
क्या क्या मिलता है उसे जाने अंजाने,
पर सब सहना पड़ता है
जैसे ले कर बैठी हो कर्ज़ा है,
जो अनगिनत सपने संजोए बैठी है
ज़रा सोचो वो अपने मन को मार कर कैसे रहती है,
भड़ती उम्र के साथ जो जीवन के रंगीन पॅलो को गवा रही है
ज़िंदगी से खफा हो कर भी मुस्कुरा रही है,
जिसे पता भी नही कब और किसके आँगन मे जाना है,
क्यूकी उसका अपना तो होता नही कोई ठिकाना है,
जो अब निश्चित है भी या नही उसको क्या है इल्म
पर बेटी का बिया ना होना बन जाता है ज़ुल्म,
किसी की बन जाती है वो चिंता का कारण ,
किसी पर बनती बोझ
अंकुश लगते हर पल उसपर
आख़िर क्या है उसका दोष,
केसे करे बेचारी निवारण अपना
जब हाथ मे नही समाधान ,
पर बेटी तो होती है पराया धन
बस उसी का भुगती है परिणाम....